मुक्ति मार्ग
हिंदू दर्शन और सनातन परंपरा के अनुसार मुक्ति (मोक्ष) मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
जीवनमुक्ति: जीवित रहते हुए ही संसार के सांसारिक मोह, माया और बंधनों से मुक्त हो जाना। ऐसा व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी निष्काम भाव से जीता है।
विदेहमुक्ति: शरीर त्यागने (मृत्यु) के बाद जन्म-मरण के चक्र से पूर्णतः मुक्त होकर परमात्मा में लीन हो जाना।
भक्ति मार्ग और शास्त्रों (विशेषकर श्रीमद्भागवत और वैष्णव परंपरा) में मुक्ति के अवस्था-आधारित 5 मुख्य प्रकार बताए गए हैं:
सालोक्य मुक्ति: इसमें जीव को परमात्मा के उसी लोक (जैसे वैकुण्ठ लोक) में निवास करने का स्थान मिलता है, जहाँ भगवान स्वयं रहते हैं।
सामीप्य मुक्ति: इसमें जीव परमात्मा के अत्यंत समीप रहने का अधिकार प्राप्त करता है और निरंतर उनकी उपस्थिति का अनुभव करता है।
सारूप्य (या सादृश्य) मुक्ति: इसमें जीव को परमात्मा के समान ही रूप, कांति और स्वरूप प्राप्त हो जाता है।
सार्ष्टि मुक्ति: इसमें जीव को परमात्मा के समान ही ऐश्वर्य, शक्तियाँ और भोग प्राप्त होते हैं।
सायुज्य मुक्ति: इसमें जीव परमात्मा के तेज या स्वरूप में पूरी तरह लीन (विलीन) हो जाता है, जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाता है।
नोट: वैष्णव भक्ति में सायुज्य मुक्ति की तुलना में भगवान की सेवा और प्रेम भक्ति को अधिक श्रेष्ठ माना गया है।
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