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मुक्ति मार्ग

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हिंदू दर्शन और सनातन परंपरा के अनुसार मुक्ति (मोक्ष) मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: ​जीवनमुक्ति: जीवित रहते हुए ही संसार के सांसारिक मोह, माया और बंधनों से मुक्त हो जाना। ऐसा व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी निष्काम भाव से जीता है। ​विदेहमुक्ति: शरीर त्यागने (मृत्यु) के बाद जन्म-मरण के चक्र से पूर्णतः मुक्त होकर परमात्मा में लीन हो जाना। ​भक्ति मार्ग और शास्त्रों (विशेषकर श्रीमद्भागवत और वैष्णव परंपरा) में मुक्ति के अवस्था-आधारित 5 मुख्य प्रकार बताए गए हैं: ​सालोक्य मुक्ति: इसमें जीव को परमात्मा के उसी लोक (जैसे वैकुण्ठ लोक) में निवास करने का स्थान मिलता है, जहाँ भगवान स्वयं रहते हैं। ​सामीप्य मुक्ति: इसमें जीव परमात्मा के अत्यंत समीप रहने का अधिकार प्राप्त करता है और निरंतर उनकी उपस्थिति का अनुभव करता है। ​सारूप्य (या सादृश्य) मुक्ति: इसमें जीव को परमात्मा के समान ही रूप, कांति और स्वरूप प्राप्त हो जाता है। ​सार्ष्टि मुक्ति: इसमें जीव को परमात्मा के समान ही ऐश्वर्य, शक्तियाँ और भोग प्राप्त होते हैं। ​सायुज्य मुक्ति: इसमें जीव परमात्मा के तेज या स्वरूप में पूरी तरह ...

पिंजरे से मुक्ति तक

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पिंजरे से मुक्ति तक पिंजरा प्रतीकात्मक रूप से उन अदृश्य बंधनों, सामाजिक मर्यादाओं और मानसिक सीमाओं का प्रतिनिधित्व करता है, विशेषकर आप—को आपकी स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति और आत्म-विकास से दूर रख ने वाली प्रतिक्रिया है।प्राणी इस पिंजरे में गर्भ काल से ही बंध जाता है।हमारे पवित्र ग्रन्थ इसे माया का बंधन मनाते हैं और इस से मुक्त होना ही कहते हैं। इस मुक्ति मार्ग को सरल और कठोर मार्गों द्वारा इतने मार्ग बता देते है कि जीव अचंभित हो पुनः इसी बंधन में बंधता रहता है।वास्तविकता कुछ भिन्न ही होती है जिसे समझाने को धर्म गुरु अपनी अपनी दुकानें सजा कर उसी बंधन मार्ग से हमारे बीच आ जाते हैं, और प्राणी को भिन्न भिन्न प्रकार के नियमों द्वारा भिन्न भिन्न बंधनों में बांधने का कार्य करते हैं जैसे महिला से ही समझते हुए हम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं  गर्भ का पिंजरा जिस से यह प्राणी मुक्ति की कामना लिए जीवन गुजार लेता है पर बंधन मुक्त नहीं हो पाता।उसे माया अपने अपने जाल में कहीं भी फंसा लेती है। गर्भ के पिंजरे के जानकार तो यह भी बताते है कि गर्भ में प्राणी भगवान से प्रार्थना करता र...