मेरे बारे में
मैने अपने जीवनकाल में अब तीसरे काल के अंतिम चरण में हूँ
बचपन: तो मूर्ख काल जैसा निकल गया जिस में जिज्ञासा का ही काल कह सकता हूं इस काल में मनके अंदर उठने वाले प्रश्नों के उत्तर देने वाले को ही गुरु मान लिया यही मेरा गोदी काल था। जिसे प्रकृति आकाश में टिमटिमाते तारों बादलों में उभरती आकृतियाँ मार्ग दर्शक बनजाती थीं ।
किशोर अवस्था:- आते ही झूठ सच का सामना होता है लड़ना झगड़ना परिस्थितियों का मुकाबला करना कलियुग का पूर्ण प्रभाव से सामना और सतयुग की कल्पना के बीच गुजरा काफी गुरु जीवन में आए और चले गये आया राम गया राम जैसा यह समय गृहस्थ जीवन का स्वर्ण काल रहा
जो अपना भला बुरा जिम्मेवारियों के पाठ पढ़ाने लगे मेरा जो बचपन मूर्खो सा था यहां बच्चों में वही पाठ पढ़ाने लग गया। पहली बार जब बच्चा आया और उसे भूख लगी वो माँ के स्तनों को कैसे पहचान गया इस का कौनसा गुरु था जो इसको भूख की तृप्ति का स्थान प्रदान करता है?वह गुरु क्या है क्या गर्भ में इसके साथ नहीं था?जैसे सैकड़ों उतर मेरे सामने पड़े थे।
अब ऐसे सभी प्रश्नों के उतर बिना गुरु प्राप्त होने लगे यानि आपे गुरु आपे चेला:आज का बुढ़ापा बन चुका है जो अभी भी पाठ ही पढ़ा रहा है बिना गुरु से मिलाए ।
अब जाकर अविनाशी गुरु को जान सका जिस की तलाश में आज भी सैकड़ों लोगों को भटकते देख रहा हूं।
अविनाशी गुरु
भारतीय शास्त्रों और आध्यात्मिक दर्शन में 'अविनाशी गुरु' का संदर्भ केवल किसी नश्वर (शरीरधारी) मनुष्य से नहीं, बल्कि उस शाश्वत 'गुरु-तत्त्व' (परमात्मा/चैतन्य शक्ति)से है जो देश, काल और वस्तु के बंधनों से परे सदैव विद्यमान रहता है।
शास्त्रों के अनुसार अविनाशी गुरु की अवधारणा को मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
शब्द-अर्थ एवं मूल अवधारणा
अविनाशी: जिसका कभी क्षय, परिवर्तन या विनाश न हो (नित्य, अजर, अमर)।
गुरु:'गु' का अर्थ है अज्ञान रूपी अंधकार और 'रु' का अर्थ है प्रकाश।
अविनाशी गुरु: वह परम-चेतना या तत्त्वदर्शी शक्ति जो साधक के मन से अज्ञान का विनाश कर उसे शाश्वत सत्य (ब्रह्म/आत्मा) से जोड़ती है।
शास्त्रोक्त संदर्भ एवं प्रमाण
गुरु गीता एवं उपनिषद
शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि गुरु का भौतिक शरीर नश्वर (विनाशी) हो सकता है, परंतु उनके भीतर स्थित ज्ञान और चैतन्य रूप
अविनाशी है:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
यहाँ गुरु को साक्षात् 'परं ब्रह्म' कहा गया है, और ब्रह्म स्वभाव से ही अविनाशी और सर्वव्यापक है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2 एवं 4)
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण दो प्रमुख बातें कहते हैं:
अविनाशी तत्त्व:"नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः— असत् (नश्वर शरीर) का कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है और सत् (अविनाशी परमात्मा) का कभी अभाव नहीं होता।
तत्त्वदर्शी गुरु: अध्याय 4 (श्लोक 34) में वे कहते हैं कि उस अविनाशी ज्ञान को पाने के लिए 'तत्त्वदर्शी' (जिसने सत्य को प्रत्यक्ष जान लिया हो) गुरु की शरण में जाना चाहिए।
श्रीरामचरितमानस (गोस्वामी तुलसीदास)
तुलसीदास जी ने जीव और परमात्मा के अविनाशी संबंध तथा गुरु की महिमा को रेखांकित किया है:
ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥
जीव स्वयं अविनाशी परमात्मा का अंश है, परंतु माया के कारण स्वयं को नश्वर मान बैठता है।
अविनाशी गुरु ही वह माध्यम हैं जो जीव को उसकी इस मूल अविनाशी स्थिति का बोध कराते हैं।
संत एवं कबीर साहित्य ('शब्द गुरु')
संत परंपरा में शरीर (देह) की अपेक्षा 'शब्द' (नाम / परमात्मा का अनाहत नाद) को अविनाशी गुरु माना गया है:
काया गुरु तो सब करे, शब्द गुरु नहिं कोय।
शब्द गुरु जो मिलै, तो जन्म मरण नहिं होय॥
शरीर नश्वर है, लेकिन गुरु द्वारा प्रदान किया गया 'सत्य शब्द' या 'नाम-तत्त्व' अविनाशी है, जो जीव को आवागमन (जन्म-मरण) के चक्र से सदा के लिए मुक्त कर देता है।जैसे दूध से बना मखन दुबारा दूध नहीं बनता वैस ही अविनाशी गुरु का चेला भी कभी गुरु नहीं बनता।
अविनाशी गुरु के मुख्य लक्षण
त्रिकालबाधित (अमर):
काल (समय) का प्रभाव शरीर पर पड़ता है, गुरु-तत्त्व पर नहीं।
आत्म-साक्षात्कार कराने वाले: वे साधक को बाहर भटकने के बजाय उसके अपने भीतर स्थित 'अविनाशी आत्मा' का अनुभव कराते हैं।यही लोग आपे गुरु आपे चेला कहलाते हैं।
बंधनों से मुक्ति:
वे कर्म, काल और माया के जाल को काटकर जीव को परम गति (मोक्ष) प्रदान करते हैं।
शास्त्रोक्त दृष्टि से अविनाशी गुरु
कोई भौतिक देह नहीं, बल्कि स्वयं
परमात्मा/शाश्वत ज्ञान-स्वरूप हैं।
जब एक साधक गुरु के स्थूल शरीर से परे उनके सूक्ष्म ज्ञान और शब्द-तत्त्व से जुड़ता है, तब वह वास्तविक अर्थ में अविनाशी गुरु की कृपा प्राप्त करता है दूसरा नहीं दूसरा तो ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी - व्याख्या
यह वीडियो श्रीरामचरितमानस के अनुसार जीव के अविनाशी स्वरूप और परमात्मा से उसके संबंध की शास्त्रोक्त व्याख्या प्रस्तुत करता है।
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