मंडार पंडित सिख पंडित कैसे बने

🖕ब्राह्मण शहीद भाई मति दास को जीवित अवस्था में ही आरी से काटकर दो हिस्सों में बांटकर मार डाला जा रहा है, यह 19वीं शताब्दी के आसपास दरबारी चित्रकार बसातुल्लाह की एक कृति का विवरण है।

पंडित मंडार सिख पंडित कैसे बने?

मंडार वंश (या मंढ़ार / Mander) पंजाब और हरियाणा क्षेत्र का एक प्राचीन गोत्र (Clan) है। यह परिवार इतिहास में क्षत्रिय पंडित, राजपूत पंडित और जट्ट पंडित  (जट्ट बाह्मण) पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। 
समय के साथ इस गोत्र वंश के कई परिवारों ने सिख धर्म अपनाया।  

​इतिहास और लोक-परंपराओं के अनुसार मंडार परिवारों के सिख बनने के मुख्य कारण और इतिहास निम्नलिखित हैं:

सिख गुरु साहिबान के उपदेशों का प्रभाव

​16वीं और 17वीं शताब्दी में जब गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु अर्जन देव जी और गुरु हरगोविंद जी ने पंजाब व मालवा ,  क्षेत्रों की यात्राएं कीं, तो जाति-पात और ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करने वाले 'सांझा उपदेश' (संगत और लंगर) से लोग बहुत प्रभावित हुए। 

मालवा और दोआबा क्षेत्र के कई राजपूत व जट्ट कृषक परिवारों (जिनमें मंडार/मंढ़ार वंश भी शामिल थे) ने सिख पंथ को अपनाया।

​1699 में 'खालसा पंथ' की स्थापना

​सन 1699 में दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में 'खालसा पंथ' का सृजन किया।

​उस समय मुगलों के अत्याचार और धार्मिक अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए पंजाब के योद्धा समुदायों वंशों के (राजपूत, जट्ट और अन्य किसानों) को संगठित होने का आह्वान किया गया।  

​मंडार वंश गोत्र के कई लड़ाका परिवारों ने गुरु जी का यह बुलावा स्वीकार किया और अपने परिवार के प्लेथी पहले पुत्र को अमृत छका कर खालसा फौज में शामिल करवा दिया।  
बंदा सिंह बहादुर और सिख मिस्लों का काल

​18वीं शताब्दी में बाबा बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में जब सिखों ने सरहिंद और पंजाब के क्षेत्रों में मुगल शासन के खिलाफ विद्रोह किया, तब पंजाब के ग्रामीण और योद्धावंश के वर्गों का बड़ा हिस्सा उनके साथ जुड़ गया।
​इसके बाद के 'सिख 

मिस्ल काल' (12 सिख मिस्लों के समय) में भी मंडार/मंढ़ार गोत्र के लोगों ने अलग-अलग मिस्लों में योद्धा के रूप में सेवाएं दीं और सिख पहचान को पूरी तरह अपना लिया।

​महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल

​19वीं सदी की शुरुआत में महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में सिख साम्राज्य स्थापित हुआ। उस दौर में पंजाब के लगभग सभी प्रमुख कृषक और क्षत्रिय गोत्रों वंशों के लोग सेना और प्रशासन का हिस्सा बने, जिससे मंडार परिवारों में सिख धर्म और संस्कृति अधिक गहराई से रच-बस गई।  
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विवरण लेख इस तरह है

मूल ऐतिहासिक रूप से क्षत्रिय/राजपूत और जट्ट योद्धा-कृषक पृष्ठभूमि।

सिख गुरुओं के समानता के उपदेश, खालसा पंथ का गठन और अत्याचारी शासकों के खिलाफ रक्षा का भाव।

आज मंडार/मंढ़ार गोत्र के अधिकांश परिवार पंजाब, हरियाणा और विदेशों में सिख पहचान के साथ आज बसे हुए नजर आ रहे हैं।

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