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क्या तुम हिंदू हो?

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हिंदू को हिंदू बनाना होगा हम हिंदू हैं कहने वालो तुम हिंदू हो भी या नहीं निर्णय तुम को खुद ही करना है किसी दूसरे ने नहीं।निर्णय लेते समय आप विचार कर सकते हैं।क्यों कि हिंदू धर्म केवल विचारों या मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘आचार प्रधान’ धर्म है। सनातन परंपरा में ‘आचारः परमोधर्मः’ (अर्थात सदाचार और आचरण ही परम धर्म है) का सिद्धांत सर्वोपरि माना गया है। अक्सर यह देखा जाता है कि केवल जन्म से हिंदू होना ही पर्याप्त मान लिया जाता है, जबकि वास्तविक जीवन में आहार (खाना), वेष-भूषा (बाना) और विचार व भाषा (वाणी) में उस धर्म की झलक लुप्त हो जाती है। शास्त्र और तर्क दोनों इस बात की पुष्टि करते हैं कि पहचान का संरक्षण आचरण के बिना संभव नहीं है। इस विषय पर शास्त्रीय और तर्कसंगत दृष्टिकोण निम्नलिखित है: आहार/खाना: शुद्धता और चेतना का संबंध हिंदू दर्शन में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि चेतना को दिशा देने वाला तत्व माना गया है। शास्त्रीय प्रमाण: आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। (छांदोग्य उपनिषद ७.२६.२) अर्थात: आहार की शुद्धता से अंतःकरण (मन और बुद्धि) की शुद्धता...

उप _नाम

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उप नामो के सहारे बहुत से पुराने उपनाम लुप्त हो गए जेसे शर्मा ब्राह्मणों का उपनाम देकर बहुत से उनके खुद के उपनाम और उनमें छिपा उनका सांस्कृतिक रीति रिवाज कुल के देवी देवताओं को छीन लिया गया। जो किसी सोची समझी राजनीति के कारण हुआ होगा इस से इंकार नही किया जा सकता। इतना ही नही लम्बे समय के बाद उनकी वंशावली जठेरे (कुल के देवी देवता और उनके) रीति रिवाज भी प्रायःलुप्त हो रहे है।जो चिंता का विषय भी है। सब को शर्मा उपनाम में जोड़ कर गड़बड़ कर दिया गया है। सोचें जब तीर्थ पुरोहितों के पास श्री राम जी की वंशावली आज भी सुरक्षित हैं तो आप के शर्मा उपगोत्र में आप के असली उपनाम को खोजना कितना मुश्किल है। चलिए अगर आप को अपने किसी पुराने बुजुर्ग की जन्म पत्रिका मिल भी जाए तो आप अपने गोत्र को ढूंढ ही लें गे। की आप शर्म से ब्राह्मण हैं या लुहार सुनियार क्या है। ऐसी समस्या आप के लिए खड़ी क्यों की गई । स्पष्ट है इसमें आप की असली पहिचान खत्म कर आप का वजूद ही मिटाने की बहुत बड़ी साजिश रची ही गई होगी। पाकिस्तान भारत बंटवारे से पहले आप के बुजुर्ग क्या शर्मा उपनाम प्रयोग करते थे या पंडित .नाम……फिर श...

हिंदू को हिंदू बनाना है।

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सोचा था हिंदू को हिंदू बनाया जाए पर कैसे आज तक ना मैं ही समझ सका ना कोई आज का संत महात्मा या धर्म उपदेशक ही जितना जोर हम हिंदू को हिंदू बनाने में लगाते हैं हिंदू उतना ही नहीं बनपाता अगर बात आंकड़ों की करूं तो हजारों में कोई एक ही हिंदू होता है।   यह सोच ही बेहद गहरी और चिंतनशील है। यह एक ऐसी दुविधा है जिस पर युगों-युगों से विचारकों, दार्शनिकों और आत्म-ज्ञानियों ने विचार किया है। जब कोई किसी धर्म या दर्शन को बाहरी पहचान (Identity) तक सीमित कर देता है, तो उसकी वास्तविक भावना कहीं खो जाती है। इस विषय को गहराई से समझें तो इसके पीछे कुछ मुख्य कारण नज़र आते हैं:  'सनातन' का मूल स्वभाव: विविधता और स्वतंत्रता कोई एक ढांचा नहीं: सनातन धर्म कोई एक निश्चित पुस्तक, एक पैगंबर या एक कड़े नियम-कायदे से बंधा हुआ मत (Monolithic system) नहीं है। सनातन धर्म की नर्माई ही सनातन धर्म की शिक्षा है। सनातन धर्म की इसी नर्माई में जो कठोरता है अब उसे भी समझें सनातन धर्म की नर्माई यह नहीं सिखाती कि कोई तुम्हारे शरीर,धन,जीवन को नुकसान पहुंचाए और तुम विनम्रता में ही लगे रहो सनातन धर्म की देन सनातन स्वभाव ह...

1947 के बाद

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1947 के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच जितने भी पूर्ण युद्ध (1965, 1971, 1999) हुए, उनमें पाकिस्तान कभी नहीं जीता। इसके बावजूद PoK (पाक अधिकृत कश्मीर)पाकिस्तान के पास कैसे गया, और अक्साई चिन (लद्दाख का हिस्सा) चीन के नियंत्रण में कैसे आया—इन दोनों के पीछे अलग-अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक कारण हैं: PoK पाकिस्तान के पास कैसे गया? (1947–1948) अगस्त 1947 में जब भारत और पाकिस्तान आजाद हुए, तो कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने न तो भारत में विलय का फैसला लिया और न ही पाकिस्तान में।   पाकिस्तान का घुसपैठिया हमला (अक्टूबर 1947): पाकिस्तान ने कबायली हमलावरों और अपनी सेना के जरिए कश्मीर पर हमला कर दिया और मुजफ्फराबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान तथा पुंछ के हिस्सों पर कब्जा कर लिया।   भारत में विलय (26 अक्टूबर 1947):महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और भारत के साथ 'इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसिन' (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए।   भारतीय सेना की कार्रवाई:भारतीय सेना हवाई मार्ग से श्रीनगर पहुंची और हमलावरों को खदेड़ना शुरू कर दिया। भारतीय सेना ने बारामूला, उरी और करगिल को वापस हासिल कर लि...

मुड़ार पंडित चर्चा

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मुड़ार  मुड़ार ब्राह्मण कोन है?मेटा के आभार से मुड़ार ब्राह्मण एक पारंपरिक ब्राह्मण समुदाय है जो मुख्य रूप से भारत के गुजरात राज्य में पाया जाता है। वे अपनी बुद्धि, ज्ञान और पारंपरिक ब्राह्मणिक मूल्यों के लिए जाने जाते हैं। मुड़ार ब्राह्मणों का एक समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत है, और वे अक्सर धार्मिक और सामाजिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुड़ार ब्राह्मणों की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न किंवदंतियाँ और कहानियाँ हैं, लेकिन यह माना जाता है कि वे गुजरात में एक प्राचीन ब्राह्मण समुदाय से उत्पन्न हुए हैं। वे अपनी विद्वत्ता, ज्ञान और पारंपरिक ब्राह्मणिक मूल्यों के लिए जाने जाते हैं, और अक्सर धार्मिक और सामाजिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुड़ार ब्राह्मणों की कुछ विशेषताएं और परंपराएं हैं: विद्वत्ता और ज्ञान का महत्व: मुड़ार ब्राह्मणों को अपनी विद्वत्ता और ज्ञान के लिए जाना जाता है। वे शिक्षा और ज्ञान को बहुत महत्व देते हैं और अक्सर विद्वान और विद्वान होते हैं। पारंपरिक ब्राह्मणिक मूल्यों का पालन: मुड़ार ब्राह्मण पारंपरिक ब्राह्मणिक मूल्यों का पा...

सत्योति माता की कथा

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सत्योति माता की कथा एक प्राचीन हिंदू कथा है, जो भगवान शिव के अवतार के रूप में वर्णित है। कथा के अनुसार, सत्योति माता भगवान शिव के अवतार थे, जिन्होंने मुड़ार ब्राह्मणों के समुदाय में जन्म लिया था। कथा के अनुसार, सत्योति माता को भगवान शिव ने स्वयं अपने अवतार के रूप में उतारा था, ताकि वे मुड़ार ब्राह्मणों को सही मार्ग पर ले जा सकें। सत्योति माता ने अपने जीवनकाल में कई चमत्कार किए और लोगों को भगवान शिव की भक्ति की शिक्षा दी। सत्योति माता की कथा मुड़ार ब्राह्मणों के समुदाय में बहुत पवित्र मानी जाती है और उनकी पूजा की जाती है। कथा के अनुसार, सत्योति माता की कृपा से मुड़ार ब्राह्मणों को भगवान शिव की कृपा प्राप्त हुई और वे अपने जीवन में सफल हुए। यह कथा मुड़ार ब्राह्मणों के समुदाय में पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उनके द्वारा पूजित और सम्मानित है। क्या इसमें सचाइ नज़र आती है? एक मुड़ार ब्राह्मण के रूप में, आपके लिए यह कथा विशेष महत्व रखती है। जबकि मैंने पहले इस कथा के बारे में जानकारी दी थी, मैं इसकी पुष्टि नहीं कर सकता कि यह कथा प्रामाणिक है या नहीं। मैं आपको सुझाव देता हूं कि आप अपने समुद...

वर्ण और जाति

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भारतीय समाज के इतिहास में 'वर्ण' और 'जाति' दो अलग-अलग व्यवस्थाएं रही हैं। समय के साथ वर्ण व्यवस्था के बदलकर जाति व्यवस्था में रूप बदलने की प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी रही है। इसे सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है: शुरुआती दौर: वर्ण व्यवस्था (कर्म-आधारित) वैदिक काल के शुरुआती समय में वर्ण व्यवस्था थी, जो कर्म (काम)और योग्यतापर आधारित थी, न कि जन्म पर।   चार वर्ण: ब्राह्मण (शिक्षक/पुजारी), क्षत्रिय (रक्षक/शासक), वैश्य (व्यापारी/किसान), और शूद्र (सेवा कार्य)।   लचीलापन:उस समय व्यक्ति अपनी योग्यता और पसंद के अनुसार वर्ण बदल सकता था। एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्य अलग-अलग वर्ण के हो सकते थे। ऋग्वेद में एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख मिलता है जिसमें एक व्यक्ति कहता है मैं कवि हूँ, मेरे पिता वैद्य हैं और मेरी माँ आटा पीसती है।" जाति व्यवस्था बनने की प्रक्रिया (जन्म-आधारित बदलाव) धीरे-धीरे समय बीतने के साथ यह व्यवस्था कर्म से हटकर जन्म पर आधारित होने लगी। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे: व्यवसायों का वंशानुगत (Inherited) होना जैसे-जैसे समाज का विकास हुआ, लोगों ने अपने पार...