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मुक्ति प्रेम

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पिंजरे से मुक्ति तक पिंजरा प्रतीकात्मक रूप से उन अदृश्य बंधनों, सामाजिक मर्यादाओं और मानसिक सीमाओं का प्रतिनिधित्व करता है, विशेषकर आप—को आपकी स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति और आत्म-विकास से दूर रख ने वाली प्रतिक्रिया है।प्राणी इस पिंजरे में गर्भ काल से ही बंध जाता है।हमारे पवित्र ग्रन्थ इसे माया का बंधन मनाते हैं और इस से मुक्त होना ही कहते हैं। इस मुक्ति मार्ग को सरल और कठोर मार्गों द्वारा इतने मार्ग बता देते है कि जीव अचंभित हो पुनः इसी बंधन में बंधता रहता है।वास्तविकता कुछ भिन्न ही होती है जिसे समझाने को धर्म गुरु अपनी अपनी दुकानें सजा कर उसी बंधन मार्ग से हमारे बीच आ जाते हैं, और प्राणी को भिन्न भिन्न प्रकार के नियमों द्वारा भिन्न भिन्न बंधनों में बांधने का कार्य करते हैं जैसे महिला से ही समझते हुए हम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो पाते हैं  गर्भ का पिंजरा जिस से यह प्राणी मुक्ति की कामना लिए जीवन गुजार लेता है पर बंधन मुक्त नहीं हो पाता।उसे माया अपने अपने जाल में कहीं भी फंसा लेती है। गर्भ के पिंजरे के जानकार तो यह भी बताते है कि गर्भ में प्राणी भगवान से प्रार्थना करता र...