वंदेमातरम विरोध
'वंदे मातरम' को लेकर विरोध और विवाद का इतिहास नया नहीं है। जब-जब इस राष्ट्रीय गीत को लेकर धार्मिक व्याख्याओं, राष्ट्रवाद की परिभाषा या प्रशासनिक दिशा-निर्देशों पर बहस छिड़ी है, तब-तब इतिहास में इसके विरोध की लहरें देखने को मिली हैं। 1905–1910: ब्रिटिश हुकूमत का विरोध और प्रतिबंध बंग-भंग (बंगाल विभाजन) के दौरान 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नारा बनकर उभरा। ब्रिटिश सरकार ने इसे औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ "उकसाने वाला" और "राजद्रोही" माना। अंग्रेजों ने सार्वजनिक रूप से 'वंदे मातरम' गाने और कहने पर प्रतिबंध लगा दिया था, तथा इसे गाने वाले छात्रों और आंदोलनकारियों को जेल व लाठीचार्ज का सामना करना पड़ता था। 1937: ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और वैचारिक मतभेद 1930 के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना और 'ऑल इंडिया मुस्लिम लीग' ने इस गीत के अंतिम छंदों (स्टैंजा) में दुर्गा माता और हिंदू देवी-देवताओं के उल्लेख पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि इस्लामी एकेश्वरवाद (एक ईश्वर की पूजा) में किसी भूमि या देवी को पूजना स्वीकार्य नहीं है। 19...