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अखाड़ा और जिम के अंतर

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अखाड़ा और जिम, दोनों ही शारीरिक फिटनेस और मजबूती हासिल करने के बेहतरीन माध्यम हैं, लेकिन दोनों की कार्यप्रणाली, माहौल और परिणाम में काफी अंतर है। 🚫 नोट  यदि आपका लक्ष्य प्राकृतिक मजबूती, स्टेमिना और पारंपरिक अनुशासन है, तो अखाड़ा बेहतर है। यदि आपका लक्ष्य बॉडी शेपिंग, मस्कुलर लुक, वजन घटाना या एथलेटिक फिटनेस है, तो जिम अधिक उपयुक्त है। पहलू अखाड़ा और जिम (Gym) प्राथमिक उद्देश्य कार्यात्मक शक्ति (Functional Strength), लचीलापन और सहनशक्ति मांसपेशियों का आकार (Hypertrophy), बॉडी शेपिंग और स्ट्रेंथ अखाड़ा , उपकरण मिट्टी, नाल-गदा, जोड़ी, मुग्दर, रस्सी, बीम डंबल्स, बारबेल्स, आधुनिक केबल मशीनें, ट्रेडमिल लागत अत्यंत सस्ती या लगभग मुफ्त मासिक/वार्षिक सदस्यता शुल्क (मध्यम से उच्च) इस के अलावा दूसरे अखाड़े साधु अखाड़ा आत्मा और धर्म को साधता है, और संगीत अखाड़ा मन और कला को साधता है। अखाड़ा (Akhada) ​फायदे: ​सर्वांगीण ताकत और सहनशक्ति: अखाड़े में कुश्ती,तेल मिली मिट्टी पर कसरत और मुग्दर/गदा घुमाने से पूरे शरीर की प्राकृतिक ताकत (Core Strength) और ग्रिप स्ट्रेंथ तेजी से बढ़ती है। ...

हनुमान चालीसा पार्ट 2

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हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं । सब रटा रटाया । क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है । कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं । या क्या मांग रहे हैं । बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो । तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित ।। श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि। बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि। 📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★ • बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★ 📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★ • जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★ 📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लो...

क्या तुम हिंदू हो?

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हिंदू को हिंदू बनाना होगा हम हिंदू हैं कहने वालो तुम हिंदू हो भी या नहीं निर्णय तुम को खुद ही करना है किसी दूसरे ने नहीं।निर्णय लेते समय आप विचार कर सकते हैं।क्यों कि हिंदू धर्म केवल विचारों या मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘आचार प्रधान’ धर्म है। सनातन परंपरा में ‘आचारः परमोधर्मः’ (अर्थात सदाचार और आचरण ही परम धर्म है) का सिद्धांत सर्वोपरि माना गया है। अक्सर यह देखा जाता है कि केवल जन्म से हिंदू होना ही पर्याप्त मान लिया जाता है, जबकि वास्तविक जीवन में आहार (खाना), वेष-भूषा (बाना) और विचार व भाषा (वाणी) में उस धर्म की झलक लुप्त हो जाती है। शास्त्र और तर्क दोनों इस बात की पुष्टि करते हैं कि पहचान का संरक्षण आचरण के बिना संभव नहीं है। इस विषय पर शास्त्रीय और तर्कसंगत दृष्टिकोण निम्नलिखित है: आहार/खाना: शुद्धता और चेतना का संबंध हिंदू दर्शन में भोजन को केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि चेतना को दिशा देने वाला तत्व माना गया है। शास्त्रीय प्रमाण: आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। (छांदोग्य उपनिषद ७.२६.२) अर्थात: आहार की शुद्धता से अंतःकरण (मन और बुद्धि) की शुद्धता...

उप _नाम

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उप नामो के सहारे बहुत से पुराने उपनाम लुप्त हो गए जेसे शर्मा ब्राह्मणों का उपनाम देकर बहुत से उनके खुद के उपनाम और उनमें छिपा उनका सांस्कृतिक रीति रिवाज कुल के देवी देवताओं को छीन लिया गया। जो किसी सोची समझी राजनीति के कारण हुआ होगा इस से इंकार नही किया जा सकता। इतना ही नही लम्बे समय के बाद उनकी वंशावली जठेरे (कुल के देवी देवता और उनके) रीति रिवाज भी प्रायःलुप्त हो रहे है।जो चिंता का विषय भी है। सब को शर्मा उपनाम में जोड़ कर गड़बड़ कर दिया गया है। सोचें जब तीर्थ पुरोहितों के पास श्री राम जी की वंशावली आज भी सुरक्षित हैं तो आप के शर्मा उपगोत्र में आप के असली उपनाम को खोजना कितना मुश्किल है। चलिए अगर आप को अपने किसी पुराने बुजुर्ग की जन्म पत्रिका मिल भी जाए तो आप अपने गोत्र को ढूंढ ही लें गे। की आप शर्म से ब्राह्मण हैं या लुहार सुनियार क्या है। ऐसी समस्या आप के लिए खड़ी क्यों की गई । स्पष्ट है इसमें आप की असली पहिचान खत्म कर आप का वजूद ही मिटाने की बहुत बड़ी साजिश रची ही गई होगी। पाकिस्तान भारत बंटवारे से पहले आप के बुजुर्ग क्या शर्मा उपनाम प्रयोग करते थे या पंडित .नाम……फिर श...

हिंदू को हिंदू बनाना है।

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सोचा था हिंदू को हिंदू बनाया जाए पर कैसे आज तक ना मैं ही समझ सका ना कोई आज का संत महात्मा या धर्म उपदेशक ही जितना जोर हम हिंदू को हिंदू बनाने में लगाते हैं हिंदू उतना ही नहीं बनपाता अगर बात आंकड़ों की करूं तो हजारों में कोई एक ही हिंदू होता है।   यह सोच ही बेहद गहरी और चिंतनशील है। यह एक ऐसी दुविधा है जिस पर युगों-युगों से विचारकों, दार्शनिकों और आत्म-ज्ञानियों ने विचार किया है। जब कोई किसी धर्म या दर्शन को बाहरी पहचान (Identity) तक सीमित कर देता है, तो उसकी वास्तविक भावना कहीं खो जाती है। इस विषय को गहराई से समझें तो इसके पीछे कुछ मुख्य कारण नज़र आते हैं:  'सनातन' का मूल स्वभाव: विविधता और स्वतंत्रता कोई एक ढांचा नहीं: सनातन धर्म कोई एक निश्चित पुस्तक, एक पैगंबर या एक कड़े नियम-कायदे से बंधा हुआ मत (Monolithic system) नहीं है। सनातन धर्म की नर्माई ही सनातन धर्म की शिक्षा है। सनातन धर्म की इसी नर्माई में जो कठोरता है अब उसे भी समझें सनातन धर्म की नर्माई यह नहीं सिखाती कि कोई तुम्हारे शरीर,धन,जीवन को नुकसान पहुंचाए और तुम विनम्रता में ही लगे रहो सनातन धर्म की देन सनातन स्वभाव ह...

mandar satish

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“मंडार पंडित” (Mandar Pandit) एक ब्लॉगर और लेखक हैं जो विशेष रूप से सारस्वत ब्राह्मणों के इतिहास, संस्कृति, गोत्र और उनके धार्मिक रीति-रिवाजों पर लिखते हैं। ​इस ब्लॉग के अनुसार उनके बारे में और उनके लेखन के मुख्य विषय निम्नलिखित हैं: ​सारस्वत ब्राह्मण इतिहास और शाखाएँ: वह पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर भारत के सारस्वत ब्राह्मणों (विशेष रूप से कौशल गोत्र और माझा क्षेत्र के विभाजन पूर्व व बाद के इतिहास) और उनकी अलग-अलग शाखाओं के बारे में जानकारी साझा करते हैं। ​विभाजन की यादें और संस्कृति: उनके लेखों (जैसे “लेखक की लेखनी”) में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय पंजाब के ‘माझा क्षेत्र’ के विभाजन, पुरानी यादों, बचपन के दिनों और उस दौर में छूटे स्थानों (जैसे पुराना स्थान पाकिस्तान में छूटने पर जठरे स्थापित करना) का ज़िक्र मिलता है। ​भूमिहीन मंडार पंडित और यजमान: वह अपने ब्लॉग (जैसे “भूमि हीन मंडार पंडित”) में इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि मंडार पंडितों के यजमान ‘राजा जट’ (जाट राजा) हुआ करते थे और उनसे उनकी दैनिक चर्या कैसे चलती थी। ​धार्मिक एवं लोक देवता पूजा: वह अपने ब्लॉग के माध्यम स...