हिंदू को हिंदू बनाना है।

सोचा था हिंदू को हिंदू बनाया जाए पर कैसे आज तक ना मैं ही समझ सका ना कोई आज का संत महात्मा या धर्म उपदेशक ही जितना जोर हम हिंदू को हिंदू बनाने में लगाते हैं हिंदू उतना ही नहीं बनपाता अगर बात आंकड़ों की करूं तो हजारों में कोई एक ही हिंदू होता है।

 यह सोच ही बेहद गहरी और चिंतनशील है। यह एक ऐसी दुविधा है जिस पर युगों-युगों से विचारकों, दार्शनिकों और आत्म-ज्ञानियों ने विचार किया है। जब कोई किसी धर्म या दर्शन को बाहरी पहचान (Identity) तक सीमित कर देता है, तो उसकी वास्तविक भावना कहीं खो जाती है।
इस विषय को गहराई से समझें तो इसके पीछे कुछ मुख्य कारण नज़र आते हैं:

 'सनातन' का मूल स्वभाव: विविधता और स्वतंत्रता
कोई एक ढांचा नहीं: सनातन धर्म कोई एक निश्चित पुस्तक, एक पैगंबर या एक कड़े नियम-कायदे से बंधा हुआ मत (Monolithic system) नहीं है।

सनातन धर्म की नर्माई ही सनातन धर्म की शिक्षा है।

सनातन धर्म की इसी नर्माई में जो कठोरता है अब उसे भी समझें सनातन धर्म की नर्माई यह नहीं सिखाती कि कोई तुम्हारे शरीर,धन,जीवन को नुकसान पहुंचाए और तुम विनम्रता में ही लगे रहो सनातन धर्म की देन सनातन स्वभाव है।अगर मखी तुम्हारे मुंह पर बार बार आकर बैठे तो उसे बलात हटा दो।

'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति': सत्य एक है, लेकिन विद्वान उसे अलग-अलग तरीकों से बताते हैं। यहाँ नास्तिक से लेकर आस्तिक और कर्मयोगी से लेकर संन्यासी तक, सभी को स्थान मिला है। इसलिए किसी एक परिभाषा में सबको ढालना स्वाभाविक रूप से कठिन है।

बाहरी आडंबर बनाम आंतरिक आचरण

कर्मकांड पर अत्यधिक ज़ोर: आज अक्सर धर्म को केवल तिलक, वेशभूषा, त्यौहारों और बाहरी प्रदर्शन तक सीमित कर दिया गया है यही सनातन धर्म के लिए हानि कारक प्वाइंट है।
नैतिकता और धर्म (Dharma): धर्म का असली अर्थ आचरण (सत्य, करुणा, अहिंसा, कर्तव्य और विवेक) है। येजब तक व्यक्ति अपने भीतर परिवर्तन नहीं लाता, तब तक बाहरी तौर पर 'हिंदू' कहलाना केवल एक सामाजिक पहचान बनकर रह जाता है।
 
हिंदू बनाने' की कोशिश और 'होने' की स्थिति

आंतरिक चेतना: धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे बाहर से किसी के ऊपर थोपा या "बनाया" जा सके। यह एक आंतरिक यात्रा है।

उदाहरण से प्रभाव: 

इतिहास गवाह है कि लोगों को उपदेशों या भाषणों से बदलना आसान नहीं होता, बल्कि जब कोई व्यक्ति स्वयं अपने आचरण और चरित्र से उदाहरण पेश करता है, तब लोग स्वतः प्रेरित होते हैं।दो उदाहरण हम सब ने देखे है देखते भी हैं 
1 राहुल गांधी
2 नरेंद्र दामोदर दास मोदी

 "हिंदू बनाना या बनाना" वास्तव में किसी को किसी ख़ास सांचे में ढालना नहीं है, बल्कि व्यक्ति को उसके भीतर के विवेक, सत्य और करुणा को जगाने में मदद करना है। जब ध्यान बाहरी संख्या और पहचान से हटकर 'व्यक्तिगत आचरण और आत्म-साक्षात्कार' पर आता है, तब धर्म का असली स्वरूप प्रकट होता है।

दार्शनिक और सामाजिक, दोनों ही दृष्टिकोण इस समस्या के मूल तक पहुँचने में हमारी मदद करते हैं।
 दार्शनिक दृष्टिकोण (उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता)
​दार्शनिक स्तर पर 'हिंदू' होना कोई सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि एक चेतना (Consciousness) है।
​'अहं ब्रह्मास्मि' और आत्म-ज्ञान: उपनिषदों का मूल सार है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर या जाति नहीं, बल्कि आत्मा है। जब तक कोई व्यक्ति स्वयं को केवल नाम, रूप और बाहरी संस्कारों से जोड़ता है, वह अज्ञान (अविद्या) में रहता है।

​कर्मयोग (गीता): श्री कृष्ण गीता में कहते हैं—कर्मण्येवाधिकारस्ते...। धर्म का अर्थ किसी सांचे में ढलना नहीं, बल्कि बिना फल की आस के निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का पालन करना है।

​ज्ञान का अभाव: आज के समय में उपनिषदों और गीता के स्वाध्याय (Self-study) की जगह केवल कर्मकांडों ने ले ली है। जब तत्वज्ञान (Core Philosophy) पीछे छूट जाता है, तो धर्म केवल बाहरी ढांचा बनकर रह जाता है।
सामाजिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण
​व्यावहारिक धरातल पर देखें तो समाज में कई ऐसी चुनौतियाँ हैं जो इस सोच को बाधित करती हैं:
​आचरण बनाम उपदेश: समाज उपदेशों से नहीं, आचरण से प्रभावित होता है। यदि धर्म उपदेशक केवल मंच से भाषण दें और जीवन में सत्य, दया व समभाव न दिखे, तो साधारण व्यक्ति पर उसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता।
जैसे काकरोच जनता पार्टी का दिल्ली में प्रदर्शन और प्रदर्शन में नरेंद्र मोदी के विरोध के बीच भद्दी भद्दी गालियाँ।

​संस्कार और शिक्षा की कमी: को जानते हुए नरेंद्र मोदी का भद्दी भद्दी गालियाँ देने वालों को माफ करना यहाँ हिन्दू होने की पहचान है।

आज परिवार और शिक्षा प्रणाली में बच्चों को सनातन दर्शन के तर्क, विज्ञान और जीवन-मूल्य नहीं सिखाए जाते। जब नींव ही कमजोर हो, तो इमारत की उम्मीद करना व्यर्थ है।

​जातिगत और सामाजिक बिखराव: सामाजिक स्तर पर रूढ़िवादिता और ऊंच-नीच की भावना ने सनातन के 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (पूरा संसार एक परिवार है) के भाव को नुकसान पहुँचाया है।
यदि किसी को वास्तव में धर्म के मार्ग पर लाना है, तो उसे "बनाने" का प्रयास छोड़ने में ही भलाई है। इसके बजाय स्वयं को एक उदाहरण बनाना होता है। जिसे नरेंद्र भाई मोदी जी ने कर के दिखाया है।एक उदाहरण समाज में दिया है।
दाँतों से अगर जीभ कट जाए खून निकल आये तो दांतों को तोड़ा नहीं जा सकता।
इसी में सनातन धर्म की कठोरता और सनातन धर्म की करुणा, विवेक, धैर्य और सत्य दिखने लगता है,।

जब आपके जीवन में करुणा, विवेक, धैर्य और सत्य दिखने लगता है, तो लोग उपदेश से नहीं, आपके व्यक्तित्व से प्रेरित होकर स्वतः उस मार्ग पर चलने लगते हैं।
​आप इस विषय के किस पहलू को अपने जीवन या आसपास के समाज में सबसे अधिक गहराई से महसूस भी करते हैं?

Comments

Popular posts from this blog

ब्राह्मण सीखों की सूची

मंडार पंडित सिख पंडित कैसे बने

मेरे बारे में