मंडार_समुदाय

जब हम इतिहास में किसी समुदाय को “राजपुरोहित”, “सलाहकार” या “शास्त्री” के रूप में देखते हैं, तो अक्सर यह गलतफहमी हो जाती है कि वे केवल कलम या पूजा-पाठ तक सीमित थे। लेकिन मंडार पंडितों के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था—वे निश्चित रूप से योद्धा भी थे।
​सनातन परंपरा में और विशेषकर पंजाब व उत्तर-पश्चिम भारत के इतिहास में, ब्राह्मणों की कई उपजातियाँ ‘भूमिहार’ या ‘शस्त्रधारी ब्राह्मणों’ की श्रेणी में आती थीं। मंडार पंडित भी इसी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा थे।
​उनके योद्धा होने और सैन्य कौशल से जुड़े कुछ मुख्य पहलू इस प्रकार हैं:
राजपूत-ब्राह्मण’ कबीलाई इतिहास
(Martial Background)
ऐतिहासिक और लोक-कथाओं के अनुसार, मंडार (जिन्हें कई क्षेत्रों में मन्दार या मुण्डार भी कहा जाता है) मूल रूप से एक योद्धा और कृषक पृष्ठभूमि (Martial and Agrarian) से ताल्लुक रखते थे। पंजाब के इतिहास में यह एक ऐसी बिरादरी थी जो शास्त्रों के ज्ञान में जितनी निपुण थी, शस्त्र चलाने और घुड़सवारी में भी उतनी ही माहिर थी।
सिख मिसलों और महाराजा की सेना में भर्ती
महाराजा रंजीत सिंह के शासनकाल (लाहौर दरबार) से पहले, जब पंजाब में सिख मिसलें (मिसल काल) मुगलों और अफगानों से लोहा ले रही थीं, तब इन क्षेत्रों के स्थानीय मंडार ब्राह्मणों ने आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे।
​जब महाराजा रंजीत सिंह ने अपनी आधुनिक सेना ‘फ़ौज-ए-ख़ास’ और ‘फ़ौज-ए-ऐन’ का गठन किया, तो उन्होंने जातिगत भेदभाव को दरकिनार कर केवल शारीरिक क्षमता और वीरता को देखा।
​अमृतसर, गुरुदासपुर और सियालकोट के क्षेत्रों से आने वाले कई मंडार पंडित महाराजा की नियमित घुड़सवार सेना (Regular Cavalry) और पैदल सेना (Infantry) में भी शामिल थे।
​युद्ध में ‘मिसर’ और ‘पंडित’ जनरलों का उदाहरण
​लाहौर दरबार में ब्राह्मण योद्धाओं का इतिहास बहुत शानदार रहा है। भले ही दरबार के सबसे प्रसिद्ध ब्राह्मण सेनापति कश्मीरी पृष्ठभूमि के मिसर दीवान चंद (जिन्होंने मुल्तान जीता) थे, लेकिन उनकी कमान के तहत लड़ने वाली टुकड़ियों में पंजाब के स्थानीय मंडार और सारस्वत ब्राह्मणों के युवा अग्रिम पंक्ति (Frontline) के सैनिक और छोटे कमांडर हुआ करते थे। इन्हें युद्ध के मैदान में उनकी बहादुरी के लिए ‘सरदार’ या ‘नायक’ जैसी उपाधियां भी मिली थीं।
शास्त्रों के साथ शस्त्र की परंपरा
मंडार पंडितों के परिवारों में एक अनूठी परंपरा थी:
​परिवार के बड़े बेटों या कुछ सदस्यों को जहाँ संस्कृत, ज्योतिष और न्यायशास्त्र की उच्च शिक्षा देकर ‘शास्त्री’ या ‘पुरोहित’ बनाया जाता था; वहीं अन्य युवाओं को अखाड़ों में भेजकर युद्ध कला, तलवारबाजी और तीरंदाजी सिखाई जाती थी ताकि वे सेना में भर्ती हो सकें।

​यह कहना बिल्कुल गलत होगा कि वे योद्धा नहीं थे। अंतर केवल इतना था कि कश्मीरी और डोगरा पंडितों (जैसे राजा ध्यान सिंह या दीवान दीनानाथ) को लाहौर दरबार में बहुत ऊंचे राजनीतिक और जनरली (Generalship) के पद मिले, जिससे उनका नाम इतिहास की किताबों में दर्ज हो गया। इसके विपरीत, मंडार पंडितों के वीरों ने सेना में मध्यम स्तर के अधिकारियों या जांबाज सैनिकों के रूप में अपनी सेवाएं दीं, जबकि उनके परिवार के विद्वान वर्ग ने दरबार में न्याय और धर्म का मोर्चा संभाला। वे “शास्त्र और शस्त्र” दोनों के धनी थे।

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