महा राजा रंजीत सिंह को मुड़ार पंडित कैसे मिले?
चलिए खोजते हैं।
महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल अपनी धार्मिक सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता और योग्यता (Merit) पर आधारित था। उन्होंने अपने दरबार में सिख, हिंदू और मुस्लिम, सभी धर्मों और समुदायों के योग्य लोगों को उच्च पदों पर नियुक्त किया था।
इतिहास में राजा-महाराजाओं के यहाँ पूजा-पाठ, राज्याभिषेक, और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए विद्वान पंडितों को नियुक्त करने की परंपरा रही है।
मंडार ब्राह्मण (Mandar Brahmins): ‘मंडार’ या मुड़ार ‘मन्दार’ (Mandar/Mander) मुख्य रूप से उत्तर भारत (विशेषकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कुछ हिस्सों) के ब्राह्मणों और अन्य समुदायों में पाए जाने वाले उपनाम/गोत्र से संबंधित हैं।
दरबार में स्थान: “महाराजा रणजीत सिंह” के लाहौर दरबार में कश्मीरी ब्राह्मणों (जैसे “दीवान दीनानाथ”) और उत्तर भारत के अन्य प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवारों का बहुत बड़ा प्रभाव था। जब उन्होंने सिख साम्राज्य का विस्तार किया, तो पंजाब और उसके आसपास के क्षेत्रों (जिसमें तत्कालीन अविभाजित पंजाब के मैदानी और पहाड़ी इलाके शामिल थे) के विद्वान ब्राह्मणों को उनके ज्ञान और कर्मकांड की विशेषज्ञता के कारण “शाही पुरोहित”, “ज्योतिषी” और “सलाहकार” के रूप में नियुक्त किया गया।
अतः, “मंडार ब्राह्मण” मूल रूप से पंजाब और उत्तर भारत के स्थानीय क्षेत्रों से ही थे, जिन्हें महाराजा की धार्मिक और प्रशासनिक उदारता के कारण लाहौर दरबार में ‘”सरकारी पंडितों”‘ या राजकीय पुरोहितों के रूप में सम्मानजनक स्थान मिला होगा। जहाँ तक महाराजा रंजीत सिंह का राज्य विस्तार हुआ “मंडार पंडित ” सरकारी पंडित के रूप में नियुक्त किये गए।
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